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विवाह में अष्टकूट का महत्व-


भकूट दोष 

भकूट दोष को राशि कूट दोष भी कहा जाता है। यह तीन प्रकार का होता है। षडाष्टक द्विद्वादश नवपंचम। भकूट दोष का सम्बन्ध राशियों से है।

षडाष्टक- परस्पर नैसर्गिक शत्रु राशियों जो अपनी राशि से छठी व आठवीं हो तो षडाष्टक दोष होता है।

कन्यामेष वृषोचाप, कामाली घटकर्कट।

मृगसिंह तुलामीन, त्यजेत शत्रु षडाष्टकम्॥

वर की राशि कन्या की राशि से या कन्या की राशि वर की राशि से दूसरी या बारहवीं हो तो द्विद्वादश नवीं और पांचवीं हो तो नवपंचम भकूट दोष होता है।

भकूट परिहार 

राशिस्वामी में मित्रता हो

राशिस्वामी एक हो

भकूट दोष होने पर ० गुण तथा शुद्ध होने पर ७ गुण होते हैं ।

नाड़ी कूट-

नाड़ी कूट का सम्बन्ध नक्षत्रों से है, नाड़ी दोष का तात्पर्य वर तथा कन्या का एक ही नाड़ी में होने से है।
एक ही नाड़ी होने पर विवाह को ताज्य माना गया है।
एक नाड़ी होने पर ० गुण तथा अलग अलग नाड़ी होने पट ८ गुण कहे गए हैं।
नारद ने तो यहाँ तक कहा है की सभी गुणों के मिलने पर भी यदि नाड़ी दोष है तो विवाह वर्जनीय है।

एकनाड़ीविवाहश्च गुणैः सर्वेः समन्वितः, वर्जनीयः प्रयत्नेन दम्पत्योर्निधनं यतः

परिहार-

दोनों का नक्षत्र एक और राशि अलग हो

दोनों का नक्षत्र एक और चरण अलग अलग हों

दोनों की राशि एक व नक्षत्र अलग अलग हों

चरण भेद न हो

चरण भेद का तात्पर्य एक ही नक्षत्र के पहले तथा चौथे व दूसरे तथा तीसरे चरण में पाद भेद होता है। 

 

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