आज हम एक ऐसे पावन दिन के बारे में बात करेंगे, जिसे हिंदू धर्म की सभी एकादशियों में सबसे कठिन, सबसे पवित्र और सबसे फलदायी माना जाता है। वह है – निर्जला एकादशी।
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, “निर्जला” का अर्थ है “बिना जल के”। यह एक ऐसा व्रत है, जिसमें साधक अन्न के साथ-साथ जल की एक बूंद का भी त्याग करता है। मान्यता है कि वर्ष की सभी 24 एकादशियों का पालन न कर पाने वाले व्यक्ति यदि केवल निर्जला एकादशी का विधि-विधान से पालन कर लें, तो उन्हें सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है।
1. निर्जला एकादशी क्या है और क्यों मनाई जाती है? (पौराणिक महत्व और कथा)
निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है।
भीमसेनी एकादशी की कथा: महाभारत काल में, पाण्डव भाइयों में से भीमसेन को भोजन अत्यंत प्रिय था और वे कभी भी भूखे नहीं रह सकते थे। वर्ष भर की सभी एकादशियों का व्रत करना उनके लिए असंभव था। दुखी होकर उन्होंने महर्षि वेदव्यास से कोई ऐसा उपाय पूछा जिससे वे भी एकादशियों का पूर्ण फल प्राप्त कर सकें। व्यासजी ने उन्हें बताया कि ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को बिना जल और अन्न ग्रहण किए व्रत करने से सभी एकादशियों का फल मिलता है। भीम ने इस कठिन व्रत को स्वीकार किया, जिसके बाद से इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। व्यासजी ने कहा कि “इस दिन कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है।”
2. 2026 में निर्जला एकादशी कब है? (तारीख और पारण समय)
वर्ष 2026 में, निर्जला एकादशी की तिथि गुरुवार , 25 जून 2026 को है।
निर्जला एकादशी का व्रत 24 घंटे का होता है, जो एकादशी के सूर्योदय से शुरू होकर द्वादशी के सूर्योदय तक चलता है।
पारण का समय: व्रत का पारण अगले दिन, यानी द्वादशी (शुक्र वार 26 जून 2026) को सुबह किया जाता है। द्वादशी तिथि को स्नान, पूजा और दान करने के बाद ही व्रत खोला जाता है।
3. निर्जला एकादशी व्रत की विधि (स्टेप-बाय-स्टेप)
इस कठिन व्रत के लिए मानसिक और शारीरिक तैयारी बहुत महत्वपूर्ण है।
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तैयारी: व्रत से एक दिन पहले (दशमी) सात्विक और हल्का भोजन करें।
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संकल्प: एकादशी के दिन सुबह जल्दी (ब्रह्म मुहूर्त) उठें। गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करें और स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र पहनें। इसके बाद भगवान विष्णु के समक्ष निर्जल व्रत का संकल्प लें: “मैं भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करूँगा।“
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पूजा: चौकी स्थापित कर उस पर पीला वस्त्र बिछाएं और भगवान विष्णु-माता लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें। पंचामृत से अभिषेक करें। चंदन, अक्षत, पीले पुष्प, धूप, दीप और तुलसी दल (तुलसी के पत्ते, जिन्हें एक दिन पहले ही तोड़ लिया गया हो) अर्पित करें।
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दिनचर्या: पूरा दिन भगवान विष्णु का ध्यान करें। ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप निरंतर करें। विष्णु सहस्रनाम या भगवद गीता का पाठ करना अत्यंत शुभ है। यदि संभव हो, तो मौन धारण करें। दिन में सोना वर्जित है।
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जागरण: रात को जागरण करें, भजन-कीर्तन करें और भगवान के मंत्रों का जाप जारी रखें।
4. व्रत के कड़े नियम: क्या करें और क्या न करें
निर्जला एकादशी के कुछ विशेष नियम हैं जिनका कड़ाई से पालन करना चाहिए ।
| क्या करें (Do’s) | क्या न करें (Don’ts) |
| निरंतर जप और ध्यान | अन्न ग्रहण करना: पूरी तरह वर्जित है। |
| दान महादान: जल, कलश, छाता, जूते, अन्न। | जल ग्रहण करना: एक बूंद पानी भी न पिएँ (आचमन के सिवा)। |
| रात्रि जागरण | क्रोध और लड़ाई-झगड़ा: मन को शांत रखें। |
| विष्णु सहस्रनाम पाठ | तुलसी पर जल चढ़ाना: इस दिन तुलसी पर जल न चढ़ाएँ और न पत्ते तोड़ें। |
| सामर्थ्यनुसार दान | दिन में सोना: व्रत भंग माना जाता है। |
5. निर्जला एकादशी के दिन दान का महत्व
ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी में यह व्रत जल के महत्व को समझाता है। इस दिन दान करने का फल अक्षय होता है।
जल दान: सबसे महत्वपूर्ण। प्यासों को मीठा जल पिलाएँ, जल से भरे मिट्टी के कलश का दान करें।
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छाता और जूते: गर्मी से बचने की वस्तुएँ दान करें।
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अन्न, वस्त्र, फल: गरीबों और जरूरतमंदों को दान करें।
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गौ दान: अत्यंत शुभ फलदायी।
6. निर्जला एकादशी व्रत के लाभ
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस व्रत के अनेक लाभ हैं:
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पाप-मोचन: सभी प्रकार के संचित पापों का नाश होता है।
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मोक्ष प्राप्ति: जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु के परम धाम की प्राप्ति होती है।
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सभी एकादशियों का फल: एक निर्जला एकादशी का फल वर्ष की सभी 24 एकादशियों के बराबर होता है।
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शारीरिक और मानसिक शुद्धि: उपवास करने से शरीर डिटॉक्स होता है और मानसिक शांति मिलती है।
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सुख-समृद्धि: पारिवारिक जीवन में खुशहाली और आर्थिक समृद्धि आती है।
निर्जला एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के प्रति समर्पण, त्याग और आत्म-संयम की परीक्षा है। यह हमें संयम, त्याग और दान के महत्व को समझाता है। भले ही यह कठिन हो, लेकिन इसकी महिमा भी उतनी ही महान है।
नोट: स्वास्थ्य समस्याओं वाले लोग, गर्भवती महिलाएँ और बुजुर्ग लोग इस कठिन व्रत को करने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें। यदि आप निर्जल नहीं रह सकते, तो जल का दान करने के बाद जल ग्रहण कर सकते हैं।
आप सभी को निर्जला एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ! जय श्री कृष्णा!


