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नाग पंचमी – कालसर्प शान्ति


नाग पंचमी पूजा-
नाग पंचमी श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर होती है। इस वर्ष यह पर्व 27 /07/ 2017 गुरुवार उत्तरा फाल्गुनी  नक्षत्र में रहेगा. यह श्रद्धा व विश्वास का पर्व है. नागों को धारण करने वाले भगवान भोलेनाथ की पूजा आराधना करना भी इस दिन विशेष रुप से शुभ माना जाता है। जिन जातकों की कुण्डली में कालसर्प योग है वे इस दिन कालसर्प योग की शान्ति का उपाय अवश्य करें।

नाग पंचमी की विशेषता –
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग देवता है. श्रावण मास में नाग पंचमी होने के कारण इस मास में धरती खोदने का कार्य नहीं किया जाता है. इसलिये इस दिन भूमि में हल चलाना, नींव खोदना शुभ नहीं माना जाता है. भूमि में नाग देवता का घर होता है।पौराणिक मान्यता भी है कि भूमि को शेषनाग अपने फनों में स्थिर किए हुए हैं इसलिए भूमि को खोदने से नागों को कष्ट होने की की संभावनाएं बनती है।

काल-सर्प योग की शान्ति –
27 जुलाई 2017 श्रावण मास शुक्ल पक्ष गुरुवार, नाग पंचमी के दिन जिन व्यक्तियों की कुण्डली में कालसर्प योग बन रहा हो उन्हें इस दोष की शान्ति के लिये इस दिन नाग देवता की पूजा अवश्य करनी चाहिए और सर्प सूक्त का पाठ किसी वेदपाठी ब्राह्मण से करवाऐं।

सर्पसूक्तमन्त्र:-

ब्रह्मलोकेषु ये सर्पा शेषनाग पुरोगमा:।नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सवर्दा।1।

इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासुकी प्रमुखादय:। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।2।

कद्रबेयाश्च ये सर्पा: मातृभक्तिपरामा।नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।3।

इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखादय: ।नमोस्तुतेभ्य: सर्पा: सुप्रीता: मम सर्वदा ।4।

सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिन च रक्षता।नमोस्तुतेभ्य: सर्पा: सुप्रीता: मम सर्वदा ।5।

मलये चैव ये सर्पा: कर्कोतक प्रमुखादय:।नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।6।

प्रार्थव्याचैव सर्पेभ्य: ये साकेत वासित।नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।7।

सर्वग्रामेषु ये सर्पा वसंतिषु संच्छिता।नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।8।

ग्रामे वा यदिवारण्ये ये सर्पाप्रचरन्ति च।नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।9।

समुन्द्रतीरे ये सर्पाये सर्पाजलवासिन:।नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।10।

रसातंलेषु ये सर्पा: अनन्तादि महाबला:।नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।11।

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