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    Home»आरती और स्तोत्र»शिव ताण्डव स्तोत्र 
    आरती और स्तोत्र

    शिव ताण्डव स्तोत्र 

    webadminBy webadminApril 13, 2014No Comments1 Min Read
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    जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले, गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।

     डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं, चकारचंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम्‌ ॥1॥

     जटाकटाहसंभ्रममंभ्रमन्निलिंपनिर्झरी, विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।

     धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके, किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥

     धराधरेंद्रनंदिनी विलासबंधुवंधुर-स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे ।

     कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

     जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-कदंबकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।

     मदांधसिंधुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदमद्भुतं बिंभर्तुभूतभर्तरि ॥4॥

     सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।

     भुजंगराजमालयानिबद्धजाटजूटकः श्रियेचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥5॥

     ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिन्गभा-निपीतपंचसायकंनमन्निलिंपनायकम्‌ ।

     सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालुमस्तुनः ॥6॥

     करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-द्धनंजयाहुतीकृतप्रचंडपंचसायके ।

     धराधरेंद्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचनेरतिर्मम ॥7॥

     नवीनमेघमंडलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर-त्कुहुनिशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।

     निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥

     प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमप्रभा वलंबिकंठकंन्दलीरुचि प्रबंधकंधरम्‌

     स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥

     अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।

     स्मरांतकं पुरातकं भवान्तकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥

     जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमश्वस- द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्कराल भाल हव्यवाट्-

     धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥

     दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकस्रजो-र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

     तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥12॥

     कदा निलिंपनिर्झरीनिकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌ ।

     विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥

     इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌ ।

     हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं विमोहनं हि देहनां सुशंकरस्य चिंतनम ॥16॥

     पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।

     तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखी प्रददाति शम्भुः ॥17॥

    ॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥

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