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पितृ पक्ष में श्राद्ध का महत्व-


शास्त्रों में मनुष्यों पर तीन प्रकार के ऋण कहे गये हैं – देव ऋण ,ऋषि ऋण  एवम पितृ ऋण | आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितरों की तृप्ति के लिए उनकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करके पितृ ऋण को उतारा जाता है |श्राद्ध में  तर्पण ,ब्राहमण भोजन एवम दान का विधान है | इस लोक में मनुष्यों द्वारा दिए गये हव्य -कव्य पदार्थ पितरों को कैसे मिलते हैं यह विचारणीय प्रश्न है |जो लोग यहाँ मृत्यु  को  प्राप्त होते हैं वायु शरीर प्राप्त करके कुछ जो पुण्यात्मा होते हैं स्वर्ग में जाते हैं ,कुछ जो पापी होते हैं अपने पापों का दंड भोगने नरक में जाते हैं तथा कुछ जीव अपने कर्मानुसार स्वर्ग तथा नर्क में सुखों या दुखों के भोगकी अवधि पूर्ण करके नया शरीर पा कर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं | जब तक पितर श्राद्धकर्ता  पुरुष की तीन पीढ़ियों तक रहते हैं ( पिता ,पितामह ,प्रपितामह ) तब तक उन्हें स्वर्ग और नर्क में भी भूख प्यास,सर्दी गर्मी  का अनुभव होता है पर कर्म न कर सकने के कारण वे अपनी भूख -प्यास आदि स्वयम मिटा सकने में असमर्थ रहते हैं | इसी लिए श्रृष्टि के आदि काल से ही पितरों के निमित्त श्राद्ध का विधान हुआ | देव लोक व पितृ लोक में स्थित पितर तो श्राद्ध काल में अपने सूक्ष्म शरीर से श्राद्ध में आमंत्रित ब्राह्मणों के शरीर में स्थित हो कर श्राद्ध का सूक्ष्म भाग ग्रहण करते हैं तथा अपने लोक में वापिस चले जाते हैं | श्राद्ध काल में यम, प्रेत तथा पितरों को श्राद्ध भाग ग्रहण करने के लिए वायु रूप में पृथ्वी लोक में जाने की अनुमति देते हैं | पर जो पितर किसी योनी में जन्म ले चुके हैं उनका भाग सार रूप से  अग्निष्वात, सोमप,आज्यप,बहिर्पद ,रश्मिप,उपहूत,आयन्तुन ,श्राद्धभुक्,नान्दीमुख नौ दिव्य पितर जो नित्य एवम सर्वज्ञ हैं, ग्रहण करते हैं तथा जीव जिस शरीर में होता है वहाँ उसी के अनुकूल भोग प्राप्ति करा कर उन्हें तृप्त करते हैं |  मनुष्य मृत्यु के बाद अपने कर्म से जिस भी योनि में जाता है उसे श्राद्ध अन्न उसी योनि के आहार के रूप में प्राप्त होता है |श्राद्ध में पितरों के नाम ,गोत्र व मन्त्र व स्वधा शब्द का उच्चारण ही प्रापक हैं जो उन तक सूक्ष्म रूप से हव्य कव्य  पहुंचाते हैं |

श्राद्ध में जो अन्न पृथ्वी पर गिरता है उस से पिशाच योनि में स्थित पितर , स्नान से भीगे वस्त्रों से गिरने वाले जल से वृक्ष योनि में स्थित पितर, पृथ्वी पर गिरने वाले जल व गंध से देव  योनि में स्थित पितर,  ब्राह्मण के आचमन के जल से पशु , कृमि व कीट योनि में स्थित पितर, अन्न व पिंड से मनुष्य योनि में स्थित पितर तृप्त होते हैं |

अमावस्या का महत्व-

पितरों के निमित्त अमावस्या तिथि में श्राद्ध व दान का विशेष महत्व है | सूर्य की सहस्र किरणों में से अमा नामक किरण प्रमुख है जिस के तेज से सूर्य समस्त लोकों को प्रकाशित करते हैं | उसी अमा में तिथि विशेष को चंद्र निवास करते हैं |इसी कारण से धर्म कार्यों में अमावस्या को विशेष महत्व दिया जाता है |पितृगण अमावस्या के दिन वायु रूप में  सूर्यास्त तक घर के द्वार पर उपस्थित रहते हैं तथा अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं | पितृ पूजा करने से मनुष्य आयु ,पुत्र ,यश कीर्ति ,पुष्टि ,बल, सुख व धन धान्य प्राप्त करते हैं  |

श्राद्ध का समय-

सूर्य व चन्द्र ग्रहण , विषुव योग,सूर्य सक्रांति ,व्यतिपात ,वैधृति योग ,भद्रा ,गजच्छायायोग ,प्रत्येक मास की अमावस्या तथा महालया में श्राद्ध करना चाहिए | श्राद्ध में कुतुप काल का विशेष महत्त्व है | सूर्योदय से आठवाँ मुहूर्त कुतुप काल कहलाता है इसी में पितृ तर्पण व श्राद्ध करने से पितरों को तृप्ति मिलती है और वे संतुष्ट हो कर आशीर्वाद प्रदान करते हैं | महालय में पितर  की मृत्यु तिथि पर  पितृ तर्पण व श्राद्ध करना चाहिए | यदि मृत्यु तिथि का ज्ञान न हो या किसी कारण से उस तिथि पर तर्पण व श्राद्ध न किया जा सका हो तो अमावस्या पर अवश्य तर्पण व श्राद्ध कार्य कर देना चाहिए |

श्राद्ध में ब्राह्मणों का चयन-

श्राद्ध के लिए ब्राह्मणों का चयन सावधानी से करना चाहिए अन्यथा श्राद्ध विफल होगा | निर्णयसिंधु ,गरुड़ पुराण ,पृथ्वी चंद्रोदय के अनुसार रोगी ,ज्योतिष का कार्य करने वाले ,राज सेवक ,गायन –वादन करने वाले ,ब्याज से वृत्ति करने वाले ,खल्वाट ,पशु बेचने वाले ,अधर्मी ,मद्य विक्रेता ,जटाधारी ,कुबड़े ,कुत्ते के काटे हुए ,गर्भ की हत्या कराने वाले ,नास्तिक ,हिंसक , अंगहीन ,स्व गोत्री ,गर्भवती या रजस्वला स्त्री का पति तथा व्यापारी ब्राह्मण को श्राद्ध के लिए निमंत्रण नहीं देना चाहिए | पिता –पुत्र या दो भाई भी एक साथ श्राद्ध कर्म में वर्जित हैं |विद्यार्थी, वेदार्थ ज्ञाता ,ब्रह्मचारी ,जीविका से हीन ,योगी ,पुत्रवान, सत्यवादी ,ज्ञाननिष्ठ,माता –पिता का भक्त ब्राह्मण तथा अपना भांजा,दामाद व दोहित्र श्राद्ध कर्म में निमंत्रण योग्य हैं | परन्तु तीर्थ में श्राद्ध करते हुए ब्राह्मणों की परीक्षा नहीं करनी चाहिए |

श्राद्ध में प्रयोग होने वाले तथा नहीं होने वाले पदार्थ-

श्राद्ध में गेहूं ,तिल ,मूंग ,यव ,काले उडद ,साठी के चावल ,केला ,ईख ,चना ,अखरोट विदारी कंद,सिंघाड़ा ,लोंग,इलायची ,अदरख ,आमला, मुनक्का ,अनार ,खांड ,गुड ,हींग ,दूध व दही के पदार्थ ,मधु, ,माल पुआ ,गौ या भैंस का घृत, खीर, शाक, का प्रयोग पितरों को तृप्त करता है अशुभ  कार्यों से कमाया धन,पालक ,पेठा,बैंगन ,शलगम ,गाजर ,लहसुन ,राजमा ,मसूर ,बासी व पैर से स्पर्श किया गया पदार्थ ,काला नमक इत्यादि श्राद्ध में निषिद्ध कहे गए हैं |

श्राद्ध से सम्बंधित अन्य शास्त्र वचन-

श्राद्ध व पितृ तर्पण में काले तिल एवम चांदी का प्रयोग पितरों को प्रसन्न करता है|  श्राद्ध में भोजन के समय  ब्राह्मण  एवम श्राद्धकर्ता का हंसना या बात चीत करना निषिद्ध है | दक्षिणा के बिना श्राद्ध व्यर्थ है,मन्त्र ,काल व विधि की त्रुटि की पूर्ती दक्षिणा से हो जाती है अतः यथा शक्ति ब्राह्मण  को दक्षिणा दे कर आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करें| जिस श्राद्ध पर  रजस्वला स्त्री ,पतित मनुष्य व सूअर कि दृष्टि पड़  जाए वह व्यर्थ हो जाता है   बासी अन्न ,केश युक्त दूषित भोजन ,रसोई बनाते समय कलह ,श्राद्ध के समय मौन न रहना व दक्षिणा रहित होने पर श्राद्ध व्यर्थ होता है | श्राद्ध करते समय भूमि पर जो भी पुष्प ,गंध,जल,अन्न गिरता है उस से पशु पक्षी ,सर्प,कीट,कृमि आदि योनियों में पड़े पितर तृप्ति प्राप्त करते हैं | धन व ब्राह्मण के अभाव में ,परदेश में ,पुत्र जन्म के समय या किसी अन्य कारण से असमर्थ होने पर श्राद्ध में यथा शक्ति कच्चा अन्न ही प्रदान करे | काले तिल व जल से बायां घुटना भूमि पर लगा कर तथा यज्ञोपवीत या कपडे का साफा दाहिने कंधे पर रख कर ,दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तथा अपने पितरों का नाम ,गोत्र बोलते हुए पितृ तीर्थ( अंगूठे और तर्जनी के मध्य ) से तीन –तीन जलान्जलियाँ देने से ही पितर तृप्त हो जाते हैं तथा आशीर्वाद दे कर अपने लोक में चले जाते हैं | जो मनुष्य इतना भी नहीं करता उसके कुल व धन संपत्ति में वृध्धि नहीं होती तथा वह परिवार सहित सदा कष्टों से पीड़ित रहता है |

श्राद्ध के आरम्भ व अंत में तीन तीन बार निम्नलिखित अमृत मन्त्र का उच्चारण करने से श्राद्ध का अक्षय फल प्राप्त होता है —-

देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च | नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः |

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